एनटीपीसी ने थर्मल पावर प्लांट्स में को-फायरिंग के लिए बायोमास (पराली) पैलेट्स की खरीद संबंधी निविदाएं आमंत्रित की

लखनऊ (लाइवभारत24)। देश की सबसे बड़ी विद्युत उत्पादक एनटीपीसी लिमिटेड ने अपने विभिन्न थर्मल प्लांट्स के लिए बायोमास (पराली) पैलेट्स की खरीद के लिए घरेलू प्रतिस्पर्धात्मक निविदा (डीसीबी) पर निविदाएं आमंत्रित की हैं। एनटीपीसी ने यह कदम फसल के अवशेषों को जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण से निपटने के लिए उठाया है। एनटीपीसी ने वर्तमान वर्ष में अपने 17 पावर प्लांटों में 5 मिलियन टन पैलेट्स की खपत होने का अनुमान लगाया है। इन प्लांटों में एनटीपीसी कोरबा (छत्तीसगढ़), एनटीपीसी फरक्का (पश्चिम बंगाल), एनटीपीसी दादरी (उत्तर प्रदेश), एनटीपीसी कुड़गी (कर्नाटक), एनटीपीसी सीपत (छत्तीसगढ़) और एनटीपीसी रिहंद (उत्तर प्रदेश) के पावर प्लांट शामिल हैं। एनटीपीसी ने बायोमास (पराली) को-फायरिंग का यह प्रयोग पहली बार 2017 में पायलट आधार पर उत्तर प्रदेश के एनटीपीसी दादरी प्लांट में किया था और इस दौरान कोयले की कुछ मात्रा के स्थान पर पैलेट बेस्ड ईंधन का उपयोग किया गया था। इस अनूठी पहल के सफल कार्यान्वयन के बाद, एनटीपीसी ने अपने 17 अत्याधुनिक संयंत्रों में मॉडल को दोहराने की योजना बनाई है। इसके लिए एसआरएम पोर्टल पर ई-निविदा के माध्यम से निविदाएं प्रस्तुत की जा सकती हैं। एनटीपीसी ने विश्वास व्यक्त किया है कि को-फायरिंग प्रोसेस के कारण बड़े पैमाने पर ग्रामीण रोजगार के अवसरों के साथ-साथ बायोमास (पराली) के लिए आपूर्ति श्रृंखला बनाने में मदद मिलेगी। विद्युत उत्पादक पंजाब और हरियाणा के आपूर्तिकर्ताओं से निविदाओं को वरीयता देंगे। निविदादाताओं को अपनी निविदा प्रस्तुत करने से पहले निविदा दस्तावेजों के प्रासंगिक प्रावधानों के बारे में एनटीपीसी को सूचित करना होगा। एनटीपीसी ने 2017 में दादरी, उत्तर प्रदेश में 100 टन पराली को जलाया था। परीक्षण-फायरिंग चार चरणों में की गई थी, जिसमें कोयले के साथ फायरिंग का प्रतिशत धीरे-धीरे 2.5 प्रतिशत से बढ़ाते हुए 10 प्रतिशत तक किया गया था। अब तक कंपनी ने 7,000 टन से अधिक पराली को जलाया है।

एक अनुमान के अनुसार हर साल फसल अवशेषों का लगभग 145 मिलियन मीट्रिक टन हिस्सा अप्रयुक्त रहता है और इसका अधिकांश हिस्सा खुले खेतों में जलाया जाता है, जिससे वायु प्रदूषण होता है और जिससे स्वास्थ्य संबंधी मसले उत्पन्न होते हैं। कटाई के बाद के मौसम में उत्तर भारत में पीएम 2.5 की वृद्धि में कृषि अवशेषों को जलाना एक प्रमुख कारण माना जाता है।

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