एक पिता के 250 बच्चों ने मनाया फादर्स-डे

निर्वाण रीहैब केंद्र में दिव्यांग बच्चों के पिता का फर्ज निभा रहे एसएस धपोला

लखनऊ (लाइव भारत 24)। एक पिता का साया बच्चों के सिर पर उस वटवृक्ष के समान होता है, जो अपने बच्चों को बिना किसी भेदभाव के प्यार करता है। उनके भविश्य को संवारने के लिये दिन रात मेहनत करता है। यहां तक कि कई बार बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए अपने सपनों को भी कुर्बान कर देता है। यह तो हुई उस पिता की बात जिसके बच्चों के शरीर में उसका खून दौड़ रहा होता है। मगर दुनिया में ऐसे भी इंसान हैं जिनका रिश्ता न तो खून का है और न ही किसी पहचान का, फिर भी वह एक पिता का फर्ज निभाते हैं। ऐसे ही बेहतरीन इंसानों में शामिल हैं, एसएस धपोला। जो उन 250 बच्चों के पिता हैं जिनसे उनका खून का नहीं बल्कि भावनाओं का रिश्ता है। जीहां, रविवार को उनके 250 दिव्यांग बच्चों ने उनके साथ फादर्स-डे मनाया।
दरअसल, एसएस धपोला के यह 250 बच्चे वह हैं, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है। ये बच्चे निर्वाण रीहैब केंद्र में रहते हैं। एसएस धपोला निर्वाण संस्था के संस्थापक हैं। निर्वाण में रहने वाले सभी बच्चे
उन्हें अपना पिता मानते हैं और पापा कहकर बुलाते हैं। फादर्स-डे के मौके पर सबने मिलकर उन्हें फूल देकर उनका सम्मान किया और उनके लिए केक काटा।

 तीस साल से कर रहे दिव्यांग बच्चों की देखभाल :

एसएस धपोला कहते हैं, 1991में उन्होंने यह संस्था शुरू की थी। जिसकी प्रेरणा बेसहारा और असहाय बच्चों को देखकर मिली। सड़क पर जब उन्हें कठिन जीवन जीते और असहाय अवस्था में कचरे में फेंका खाना खाते देखता था तो बहुत दुख होता था। फिर निश्चय किया कि इनके लिए कुछ अवश्य करूंगा।और फिर 1991 में मैंने संस्था की शुरुआत की। तब से आज तक इन बच्चों की परवरिश कर रहा हूं। संस्था में ज्यादातर बच्चे मानसिक दिव्यांग हैं। कुछ साल पहले जंगली जानवरों के बीच पलने वाली ‘मोगली’ गर्ल भी मेरे पास लाई गई थी। जिसे बड़ी मेहनत से सामाजिक तौर-तरीके सिखाए।
बेटों को देता हूं समाज सेवा की सीख
वह कहते हैं, मेरे दो बेटे हैं। बड़ा बेटा द्रोण और छोटा वियांन। पत्नी और मैं हमेशा उनको समाज सेवा और लोगों की मदद करने की सीख देते हैं। हमारा मानना है कि ईश्वर ने यदि दुनिया में इंसान बनाकर भेजा है तो इंसान होने का फर्ज भी हमें ही निभाना चाहिए। मेरी यह सेवा निरंतर चलती रहे बस ईश्वर से यही कामना है।

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